मैं जब रक्षाबंधन के पर्व पर अपने गाँव गया तो वहां का माहौल बिल्कुल शहर से अलग था।यहाँ कोरोना से बचाव के साथ लोग काम कर रहैं हैं और गाँव में लोग खुले मे आसानी से कार्य कर रहे हैं।
मूँग का खेत
लेकिन गाँँवों की दिनचर्या शहरो से बहुत कठिन संघर्षशील है। गाँँव में लोग जल्दी उठतें हैं। जल्दी उठकर महिलाएँ घर का कार्य करती हैं। पशुओं को चारा, बंटा खिलातें हैं। पशुओं का दुध निकालतें हैं। फिर नहाना,धोना ,पूजा - पाठ करना फिर भोजन करके खेतों में कार्य करने जाते हैं जहाँ दिनभर चिल्लचिल्लाती धूप मे कार्य करके शाम को पांच-छह बजे के लगभग अपने घर थक्के-हारे आते हैं। कुछ देर आराम करके फिर अपने घर के कामों और पशुओं को चारा डालना दुध निकालना आदि कार्यों मे लगें रहतें हैं। फिर रात का भोजन करके जल्दी सो जातेंं हैं।अगले दिन फिर वही दिनचर्या चलती रहती है। किसान इतनी मेहनत करके अन्न, दाले आदि उत्पन करते है फिर भी उसी किसान को अपनी फसल उचित दामों पर बेचने का अधिक्कार नहीं है। वही किसान अपनी फसलों को बेचनेंं के लिए धर-धर की ठोकरे खाता है।और जब स्वयं बाजार से सामान खरीदता है तो मनमर्जी के दाम वसूल करते हैं। यह अन्याय ही नहीं ,किसानों के साथ घोर अन्याय नहीं तो क्या हैं?
क्या उस किसान के परिवार, रिस्ते नहीं है? क्या उसके बच्चे नही है? क्या वो बच्चे पढ़तें नहीं हैं? क्या उस किसान के कोई खर्चा नहीं हैं? इन सवालों के जवाब आज भी नहीं है। वो बेचारा किसान आत्महत्या नही करे तो क्या करे ?
खेर किसानो के नाम पर राजनीति करते रहतें हैं लेकिन वास्तव मे जमीन पर कुछ नही होता है।











